भ्रम

जिंदगी भर सपने में जिया और कभी भ्रम में
मानो विचरता रहा, कहीं कल्पित संसार में।
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यकायक दोनों टूट गए सच के धरातल पर
अब नहीं रहता, वो किसी तन्द्रा या किसी धोखे में।
अपर्णा शर्मा
May21st,24

संस्कार

पहली पीढ़ी से ले कर अमूल्य संस्कार
दूजी ने तीजी पीढ़ी को दिए अशुद्ध आचरण
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जो सच्चे संवाहक न बने संस्कारों के
वृद्धावस्था में दिखेगा अंधकार ही अंधकार.
अपर्णा शर्मा
May14th,24

अस्तित्व

अंत में, अस्तित्व खो कर समन्दर हो गई
मीठी नदी,समंदर में मिल कर खारी हो गई
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चटकी तो होगी चाहत और डिगा होगा विश्वास भी
आखिर क्या थी मैं? जो प्रेम में अपना सत्व खो गई।
अपर्णा शर्मा
May 7th,24

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