कभी-कभी अवचेतन मन में भावों के बादल घिरते है
तभी-तभी शब्दों के कोलाहल में अर्थ खोने लगते हैं।
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व्यस्तताओं का,उच्चतम बिंदु के,उच्च तक बढ़ जाना
और कभी गहन खालीपन,भावों को खाली कर देते हैं।
अपर्णा शर्मा
March25th,25
उदास घर
इस बरस भी शहर में कुछ मकान बेरंग रह गए
द्वार, आँगन और दीवारें फिर से खुश्क रह गए।
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अपनों के इंतजार में ही बरस पल- पल गुजर रहे
उदास घरों में इस बार भी उदास रंग बिखर गए।
अपर्णा शर्मा
March18th,25
त्योहार
त्योहार इसलिए भी जरूरी,कि जिंदगी में उल्लास आ जाए।
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झंझावातों में उलझे, मनुष्य को, कुछ आराम आ जाए।
अपर्णा शर्मा
March, 11th,25
