छोड़ चला

जाड़े की आधी रात में, वादों, सपनों में लिपटा
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यादें दे,गम छोड़ चला, एक साल फिर से बीता।
अपर्णा शर्मा
Dec.17th,24

जीते रहे जिंदगी

ये ख्वाहिश थी,या,थे खरे से वो ख़्वाब
कि राहें चलती रहे, हमारे साथ साथ।
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न तुम कभी थको, न हम कभी रुके
जीते रहे जिंदगी, हर पल, हर साँस।
अपर्णा शर्मा
Dec.10th,24

आत्मिक प्रेम

शिकवे,शिकायत हो,जब धूमिल
अधरों पर,स्मिता हो जब,सात्विक।
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मौन की हो, जब,अनवरत वार्ता
यहीं रुप है प्रेम का, तब आत्मिक।
अपर्णा शर्मा
Dec.3rd,24

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