जहाँ सूरज के उगने से पहले जिदगी जग जाती थी
जागा,जागा होता घर और तुलसी पूजी जाती थी
सुबह सुबह का हो-हल्ला,जैसे उत्सव हो घर में
दरवाजे पर नहीं ये ताला,लगा है उस उत्सव पे।
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घर के आंगन में बड़ीया,अचार पापड़ का फैलाव
बूढ़ी दादी का बक्सा था और बच्चों का होता जमाव
चूड़ी पायल की खनखानाहट थी जिस आँगन में.
दरवाजे पर नहीं ये ताला,लगा है उस आनंद पे।
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प्रिय की प्रतीक्षा में साँझ ढले यहीं दरवाजा
सजता था दीपक और इतराता था दरवाजा
प्रिय के आने से घर भर जाता था रौनक से
दरवाजे पर नहीं ये ताला,लगा है उस रौनक पे।
अपर्णा शर्मा
August 22nd,25
एहसास
मन में गहरे दबे भाव
बंद हवा से एहसास
कभी शब्द न पा सके
घुट गए साँस दर साँस।
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कभी झूठ से छिप गए
पाबंदी में जकड़ते गए
बेपर्दा होने को मचलते
एहसास फिर दिख गए।
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खुल कर कभी बिखरे जो
मंज़िल पा कर ही रहे वो
गर एहसास रोक लिए
घुटन की शक्ल में दिखे वो।
अपर्णा शर्मा
August15th,25
भंवर
जीवन रूपी भंवर से, कोई निकल न पाए
आस लगे उबरने की, त्यों-त्यों फंसता जाए।
नदियों के गहरे भंवरों से,कब का बचना सीख गया
पर जीवन के मोह भंवर में,खुद ही जाकर फिसल गया।
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असीम आकर्षण होता इस भंवर में, आकर्षित कर ही लेता है
पास जाए बिन,मन न माने और ये अपनी बाहों में भर लेता है।
भंवर चक्र में, फंसकर मानव, खूब चक्र सा घूमे
प्रेम-पाश में फंसकर, फिर वो, अपना लक्ष्य भूले।
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सारी शक्ति, तिल-तिल कर,इसी भंवर में सोखी जाती
कैसे कर ? बाहर निकलूँ , कोई चाल समझ न आती।
मोह का भंवर जब शांत हो,ऊर्जा कुछ न बचती
बाहर अगर आ गया,तब तक,जीवन टूटी नैया होती।
अपर्णा शर्मा
August 8th,2025
