श्रृंगार और सादगी



मानव और प्रकृति सदा से श्रृंगारित होती आई
अपने स्वगुणों से दोनों ने सदा पहचान बनाई।

मानव मन को श्रृंगार सदा खूब ही भाया
सो जन्म से मृत्यु तक गुणों को खूब बढ़ाया।

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भोला,जिज्ञासु बालक,कभी लक्ष्य का पीछा करती,तरुणाई
स्त्री का ममत्व सा प्रबंधन,वहीं पुरुष की धीरजता,संतुष्टि लाई।

भद्रजनों का स्नेह भरा व्यवहार जीने की कला सिखाता
मन के श्रृंगार से तन की सुंदरता का उत्तम ज्ञान कराता।

गुणों में वृद्धि,सुंदरता में वृद्धि कर अवगुणों को मिटाती
मानवगुणों से सज कर श्रृंगार की सादगी मन को भाती ।

देहरी के पार

धीरे-धीरे अवधि समाप्ति पर आई है
विदाई की बेला पास और पास आई है।

समेट लिया उसने बक्सा समय का
बना लिया बही खाता हर तारीख का।

भर लिया हँसी खुशी की यादों का खजाना
टंगा है थैला भी, जिस में बोझ है दुखों का।

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जा रहा है,सबके कुछ ना कुछ काम करके पूरे
दे जाएगा, नवागत को, जो रह गए काम अधूरे।

देहरी के दूसरी ओर , कुछ पग की दूरी पर
वो खड़ा है, उत्साहित सा अपने आगमन पर।

आगत की खुशी और विगत के विदाई की विडंबना
विदाई ले 2022,थमा देगा 23 को सभी कार्य योजना.

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क्रिसमस



देखो! आया क्रिसमस का त्योहार
सर्दी में करता, खूब ऊर्जा का संचार।

सैंटा आता, अपने रथ पर, होके सवार
बच्चों को देता,सुन्दर,प्यारे-प्यारे उपहार।

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पर्व पर सबकी मुरादें पूरी करने
सोई भावना को दिल में जगाने।

सबमें जीने की चाह जगाता है
सबको ही आशावान बनाता है।

आगत साल की नई सी खुशराह दिखाता है
क्रिसमस बेरंग जीवन को सुर्ख रंग जाता है।

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