नूतन प्रेम

मैंने यहाँ वहाँ संपूर्ण संसार में 
जीवन खो दिया उसकी खोज  में ।
आजकल कोई  उसे  जानता नहीं
उसे  व उसके स्पर्श पहचानता नहीं ।
अधिकांशतः
वह मिल जाता है,कभी राह  में
ऐसा होता  है सिर्फ़  स्वप्न   में ।
स्वार्थ  की  दुर्गन्ध  से लिप्त
खो गया किसी चौराहे  पर

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एक दिन
सिसकियाँ, कराहना सुना मैंने
लावारिस  पड़ा घाव देखता वह
मुझे बेबसी से उसने देखा
कहा ,
मुझे ही तुम खोजते हो ।
मैं ही प्रेम हूँ,
लावारिस हूँ।।
दिखावे के लिए मुझे सब अपनाते है
और स्वार्थ में अंधे हो
यहाँ  छोड़ जाते है।

अपर्णा शर्मा Feb. 21st,25 (पुनः प्रकाशित)

दिल की दास्तान



दिल के किसी कोने में महफ़ूज़ उसकी बातें,यादें मुलाकातें.
वो बिना ओर छोर की लगातार बातें, यादगार मुलाकातें.

अपने ही रंग तरंग में डूब लहराती, मचलती सी गुफ़्तगू.
मेरे हर सवाल को लाजवाब सा जवाब देती गुफ़्तगू.

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नजरो का नज़र से मिलने पर नजर चुरा कर देखती नज़रे.
पास आते ही रास्ता बदल दूर तक पीछा करती नज़रे.

सूखे फूल,तीन पत्ती, काग़ज़ के पीले पन्ने है जिंदगी की यादें.
खजाना खूब है पाया मोहब्बत में खो कर मिली है दर्द सी यादें.
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शरारतों से भरे दिन,एक चुप्पी को समझ बैठते थे
मुलाकातें.
पास से गुज़रे,जमघट में कभी उठते-बैठते, यही थी मुलाकातें.

सात पर्दों में छिपी, महफूज रखी है मैंने दास्तान.
मुमकिन नहीं पर यहीं है मोहब्बत से रीते दिल की दास्तान.

समझौते

मासूम रही जब तक ज़िंदगी
बिंदास जीते रहे
समझदारियों ने फिर धीरेधीरे
समझौते सिखा दिए।


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जब मन के चपल समंदर में
ख्वाहिशों के ढेरों ज्वार उठे
तब समझौते के शांत भाटा ने
जिम्मेदारी के किनारे दिखा दिए।

समझौता शब्द जब पढ़ा मैंने
सम का अर्थ बराबर समझा
और समझौते के क्रियान्वयन
सदा एकतरफा ही दिखाई दिए।

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