कंटक

हर कली पुष्पित हो झूम रही
उपवन को सुरभित कर रही
प्रफुल्लित मन में जगती तृष्णा
पुष्प पाने की आस जगा रही।

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विपुल अभिलाषा सदा रखे
पुष्प जो शूल कंटको से घिरे
मन प्राण में लालसा को जगाए
अंगीकार को मन उपवन तरसे।

हर कली पुष्प के समीप ही
पत्तियों के साथ साथ शूल भी
कुसुम को रक्षित कर रहे
एषा बनी आकाश कुसुम सी।

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कंटक नहीं ये कवच से डटे
पुष्प की रक्षा को अडिग खड़े
कोई भी प्रहार करे पुष्प पर
लहू-लुहान कर उसे जा चुभे।

इश्क मुखर हो गया



कोई दिल को भा गया
रोम-रोम में समा गया ।
नज़रे बोलती रही
लबों पर मौन छा गया ।

ख़त जब उसे लिखा
बस नाम ही था लिखा ।
भावनायें बोल रही
शब्द मौन हो गया ।

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आचरण सब बदल गया
व्यवहार कुशल हो गया ।
सब हैरां से देख रहे
चापल्य मौन हो गया ।

समय ठहर सा गया
ख़्याल ने ख़्याल जिया ।
चित्त हर्षित हो रहा
इश्क मुखर हो गया । अपर्णा शर्मा

मुआयना

जिंदगी के हर खुशनुमा पल में, जब देखा आईना
ग़मों की टीस,दर्द की चीस से होता रहा सामना ।

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ग़म के सागर में,डूबते तैरते,गुजर गई ना जाने कितनी रातें
खुशी के पैमाने छलके,तो भी नींद के इंतजार में थी रातें ।

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उसकी आँखें ही,मेरे हर अक़्स का हमेशा रही आईना
हर खुशी, ग़म का करती रही जो ताउम्र मुआयना ।

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