अकेलापन


व्यस्तता के दिनों में अकेलापन स्वप्न सा दिखे
और इस प्रिय स्वप्न में अकेलापन झूला सा झूले।

व्यस्त ज़िंदगी में फुर्सत के पल सुकून से पले
अकेले होने के लाभ नज़र में रहते हैं हर पल बसे।

लाचारीवश अकेलापन जीवन में जब आए
अंधेरों में कराहाए और उजालों में भी डराए।
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ऊपर से शांत झील सा,अंदर समंदर सा मचलता
अकेलापन वज़ूद को शनैः शनैः खोखला ही करता।


स्वयं का अपनाया अकेलापन जन्म देता नए सृजन का
आत्म ज्ञान और आत्म बोध से नव व्यक्तिव को खोजता।
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वहीं थोपा हुआ अकेलापन आ जाए गर जीवन में
अति शक्तिशाली व्यक्तित्व भी घिर जाए अवसाद में।

एकांत हेतु अकेलापन है मानो सर्वश्रेष्ठ उपहार
मजबूरीवश अकेलापन से होता रोगों का आगाज।
अपर्णा शर्मा April 28th, 23

रंग बदलती दुनिया



परिवर्तन ही सत्य है,
सुनकर मन को भाता है
मौसम का परिवर्तन भी
नित,नई आस जगाता है
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बालक का कुछ नया सीखना
बरबस हर्षित कर जाता है।
प्रतिदिन शिशु का वृद्धि करना
सुख में वृद्धि कर जाता है

इस रंग बिरंगी दुनिया में
नए से नाता जुड़ता जाता है
सब कुछ बदले इस दुनिया में
पर इंसा पहले सा ही भाता है
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इंसा ग़र बदले,जैसे दुनिया
जीवन घोर स्याह हो जाता है
इस रस सी मीठी दुनिया में
जीना फीका फीका हो जाता है

शायद अभिमन्यु…….

जीवन के संघर्ष भरे चक्रव्यूह में
वीर अभिमन्यु से लड़ जाए
प्रवीण हो कर, पराक्रम रूप में
योद्धाओं से फिर भिड़ जाए
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जब निरंतर व्यूह के संघर्षों में
शिकंजा मजबूती से कस जाए।
स्वरचित कृत्रिम इस संसार में
कोई ओर-छोर नज़र न आए
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तब एक संवाद स्वयं का स्वयं से
कर लेना आवश्यक हो जाए
अपनी शक्ति,अपनी दुर्बलता से
अपना साक्षात्कार हो जाए

फिर सहसा,सर्व शक्ति एकत्र हो
वीर अर्जुन सा भान करा जाए
सभी चक्रों को भेद, विजयी हो
शायद अभिमन्यु बाहर निकल आए

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