हमदम,हरदिल,अजीज सूरज सा
गहराता जीवन में घुलता रात्री सा
चाँद की चाँदनी सा हुआ अलंकृत
स्वार्थ से परे अनवरत ऐसा एक रिश्ता।
मौसम का ना होता कोई असर
ऋतु से अनजान सबसे बेख़बर
हर पल का साथ जैसे खिले बसंत
एक दूजे के सदा ही बनते रहबर।
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किसी एक की यक सी अनुपस्थिति
समझ न आती दूजे को ये परिस्थिति
आवारा बादल यहाँ वहाँ विचरता
खुद से बदली बदली लगे अपनी ही मनःस्थिति।
यह विछोह अंतर्मन को झकझोरे
देख सखा को हृदय में उठे हिलोरे
तन मन में शीतलता का ज्वार उठा
जैसे शांत से समंदर में लहरों की मौजे।
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शुक्र है जो जीवन में विरह आता
इंतजार ही इश्क की पहचान कराता
जब एक एक पल सदी सा दीर्घ हो जाए
उसी क्षण, पहली दस्तक इश्क दे जाता।
अपर्णा शर्मा
August 25th, 23
ओढ़नी
प्रेम के धागों में लिपटी बिटिया आँगन में आई
देखो पूरे घर में खुशियां ही खुशियां मुस्काई।
संस्कारों के रंगों से प्रेम धागे सुंदर रंगे है
सभी के चेहरे उसे देख खिल से गए हैं।
रोज थोड़ा आगत का करघा चुनरी बुनता रहा
भविष्य के लिए बिटिया को ऐसे गढ़ता रहा।
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घर भर की रौनक के सलमें-सितारे सजा कर
लड़कपन की दहलीज पर आ गई मुस्करा कर।
सतरंगी सपनों की किनारी करीने से उसने सजा ली
झिलमिल से गोटे में भविष्य की आस छुपा ली।
धीरे से, जिंदगी ने दायित्वों की लाल चूनर ओढ़ा दी
दुल्हन बन, उसने मान मर्यादा भी अपने से लिपटा ली।
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जब बहु बनी बिटिया ने समय चक्र को पहचाना
तब सही लगा शर्म,हया की चुनरी को अलमीरा में सजाना।
आज भी वो दायित्वों की चादर में लिपटी है
अपनी ममता की ओढ़नी से दे रही रोशनी है।
अपर्णा शर्मा
August 18th, 23
नफ़रतों का ज़हर
नजीर से भरे वो दिन खो गए
इधर से उधर कहीं बिखर गए
अज़ान से गूंजती थी कभी सुबह
जागता था तब सूरज अलसुबह
तब बसता यहाँ मोहब्बत का शहर था।
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सुहानी सी शाम और नाद घंटियों का
तराना लहराता फ़िजा में,आरतीयों का
हर कोई सुकून से विचरता, बेफिक्र सा
डर नहीं अंधेरी रात का,मगन वो सुखद शाम सा
तब बसता यहाँ मोहब्बत का शहर था।
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अदब से मिलना,सभी का रिवाज था
कोई फर्क़ नहीं कि राम राम,या सलाम था
अति विश्वासी अपने धर्म का,पर पहले वो इंसान था
पूरी दुनिया में सर्व धर्म समभाव ही हमारी पहचान था
तब बसता यहाँ मोहब्बत का शहर था।
गुम हैं हर कोई,मतलब से भरी दुनिया के,जुनून में
गुम है कहीं इंसानियत,धर्म पर चढ़े नफरती लिबास में
घृणा में डूबा वो आम जन, अब ना बेख़बर है
कड़वी, सख्त जुबान का हुआ ऐसा असर है
अब फ़िजा में घुला नफरतों का जहर है।
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काश! कबूल हो जाए, दुआ हम सभी की
घुल जाए हर गांव, शहर में हवा प्रीत की
गंगा जमुना से मिल,एक दूजे में,प्रयाग तीर्थ बने
ईद, दिवाली, वैशाखी सभी हमारी पहचान बने
ये ठहर कर,बस जरा! समझने का पहर है
देश मेरा नफरती जहर से नहीं मोहब्बत से अमर है।
अपर्णा शर्मा
August 11th, 23
