हे पुरुष!

हे पुरुष!
बिन स्त्री तुम निरीह से
सदा अस्तित्व से परे
संबल बन सभी का
खुद को गवांते जा रहे।
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हे पुरुष!
अपने लिए भी जियो जरा
परवाह से तू क्यूँ कर डरा
सबके लिए जीता रहा सदा
जरूरत पर अपने करे किनारा।
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हे पुरुष!
सब कुछ कैसे सह लेता
अपनी पहचान खो देता
पुरुषत्व का कल्पित ताज
और भी बोझ बढ़ा देता।
अपर्णा शर्मा
Nov.19th,23
( अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस पर)

विश्वास

हिम के पिघलते ही
आविर्भाव होते ही
निकल पड़ी गंतव्य को
रिसती, अविचल सी.
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अल्हड़पन से मचलती
कंकर, पत्थरों को रौंदती
कुछ को हटा, कुछ साथ ले
प्रेम-परकाष्ठा में विकलती .

शनैः शनैः, बनी वो विक्षनरी
शांत बहती,अत्यंत धीर धरी
वृद्धा हो, अशेष पतली धारा
लक्ष्य को आतुर, मार्ग खोजती.
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अंत में,अस्तित्व खो समन्दर हुई
मीठी सी नदी अब खारी हो गई
चटकी तो होगी चाहत और डिगा होगा विश्वास भी
आखिर क्या थी मैं ? क्या हो गई?
अपर्णा शर्मा
Nov.17th,23

रौनक

पंच दिवसीय पर्व, घर-घर खोज रहा रौनक को
मार्ग तिराहे,चौक-चौबारे,लुभा रहे हर दिल को।

हर आँगन,सज रही, रंगों भरी रंगोली
नित-नई अल्पना,मनभावन खूब उकेरी।
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घर-आंगन में,चमक धमक की दिवाली आई
रात में रंग रंगीली लड़ीया बतिया खूब बनाई।

इनके मध्य, मस्ताना कंदील,बना है,कृष्ण कन्हैया
खील,बताशे,खांड-खिलौने देख मन हुआ ललचईया।
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आँगन बैठी, बूढी दादी, न जाने चुप क्यों बैठी है ?
सारी रौनक उड़ी यहाँ से,दूजे घर अब वो बसती है।
अपर्णा शर्मा
Nov.,10th,23

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