गलत

हर गलत को जब जब सही किया
तब तब नया व्यक्तित्व गढ़ता गया.

हर गलती समझदार बनाती रही
यूँ मासूमियत से दूर होता गया.

हर गलत पर इंसान बनता रहा
और अपने से,बहुत दूर होता गया.

कुछ बहुत सही सा था मेरे लिए
वो गलत सा सबको चुभता गया.

जब गलत को गलत कहा जोर देकर तब वजूद सच का खो सा गया.

अपर्णा शर्मा
Dec.29th,23

दिखावा

रिश्तों से भरे इस मेले में
प्रियजनों के मंजुल रेले में
हर एक जान से प्यारा लागे
क्यूँ भूले,सब दिखावे का खेला रे?
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जीवन की टेढी-मेढ़ी राहों में
दुःख सुख की पगडंडियों में
जिन्हें प्रेम का हमराही माना था
वो सुख का ठिकाना बने रहे।

ऐसा कोई पैमाना भी नहीं
जो प्रेम को तौले सही सही
समय ही मात्र उपाय इसका
और कोई मूल्यांकन नहीं।
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राग अनुराग जो तन में भर जाए
श्रद्धा से मन भी झुक झुक जाए
वहां दिखावे का कोई स्थान नहीं
प्रेमी केवल ईश्वर सा हो जाए.।
अपर्णा शर्मा
Dec.22nd,23

तुम्हें पता है न

तुम्हें पता है न
मेरा तुमसे पहले उठ जाना
सब कुछ व्यवस्थित करना
हर वस्तु को सही स्थान देना
नहीं पता इसके पीछे छुपा प्रेम।
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तुम्हें पता है न
मेरा हर पल परेशान रहना
परेशानी में साथ खड़े रहना
और तुम पर आँच न आने देना
नहीं पता इसके पीछे छुपा प्रेम।

तुम्हें पता है न
मेरा हर खुशी को जश्न में बदलना
जश्न में जोश से हरपल भरे रहना
हरपल को नया आयाम देते रहना.
नहीं पता इसके पीछे छुपा प्रेम।
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तुम्हें पता है न
घर को चलाएमान रखने का अंदाज
जिंदगी में सुरों की सरगम की ताल
मैं और तुम का हम,जो बना हमराज
बस नहीं पता इसके पीछे छुपा प्रेम।
अपर्णा शर्मा
Dec.15th,23

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