विभावरी संग आकाश गंगा के आंचल में
कभी टंकते,कभी उधड़ते रहे अनगिनत सितारे
तब नव दिवस का संदेश दिया शुक्र नक्षत्र ने
कुछ ही समय बस शेष था अरुणोदय में।
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शैय्या को त्याग कर, कर्म को हो रहे तत्पर
गृह स्वच्छ कर, अल्पना सज रही देहरी पर
इष्ट वंदन और करबद्ध प्रतीक्षा आगमन की
नित्य स्वागत को प्रतीक्षित रहते नारी और नर।
शनैः शनैः पर्वत के पृष्ठ पर लालिमा छाई
शिशु सी किलोल करती जल तरंग पर आई
प्रकाश पिनाक से निकल कमान किरण की
डाल, पात से गुजर अट्टालिका पर छाई।
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पक्षियों का कलरव,और पशुओं का बोलना
कलियों का पुष्पों में परिवर्तित हो महकना
तितलियों के संग भौरों का होता जब गुंजन
यूँ उदित हो सूर्य,संचारित करते संसार में जीवन का।
अपर्णा शर्मा
April 26th,24
काँच से रिश्ते
प्रेम से खूब सँवारे थे
ख़यालों से सहेजे थे
सब ने पोषित किए
मोहब्बत के रिश्ते थे.
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प्रेम के बीज़ बो कर
लता सा मिला आकार
इक दूजे के गलबहियां
बीत रहा समय संसार.
क्षण के सोच का असर
छा गया फिर इस कदर
छन से टूट गया रिश्ता
बिखरा काँच सा इधर-उधर.
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रिश्ता रुसवा हो गया
काँच दिल में चुभता गया
समय पर न सचेतना
रिश्ते को दाग दे गया.
अपर्णा शर्मा
April 19th,24
मेरी परछाई
सूरज के चढ़ते ही वो
मेरे संग संग हो लेती है
जहाँ-जहाँ मैं चलूँ वो
मेरे आगे पीछे ही रहती है.
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मेरे हर एक काम में वो
रखती साझेदारी है
साथ छूटे, चाहे सबका
वो रखती वफ़ादारी है.
मेरे अक्स में नानी,माँ सी
वो अक्सर मिल जाती है
और कभी मेरे प्यारे नन्हों में
मुझको झांसा दे जाती है.
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पर ये केवल प्यार अनुराग की
रोशनी में ही जीवित रहती है
घृणा, द्वेष के घोर अंधियारे में
परछाई न जीवित रहती है.
स्वरचित :
अपर्णा शर्मा April 12th,24
