माँ*

जब जब तीव्र होता बालक का दर्द
तड़पती माँ और चेहरा हो जाता जर्द
ढाढस दे फ़र्द अपने को बढ़ाती हौसले को
बेबस है लाचार नहीं, झाड़ती जिंदगी के हर गर्द।
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माँ और बालक का होता निराला ही संसार
जहाँ हर वक़्त होता प्रेम का अद्भुत संचार
इक दूजे के सपनों के,माँ बालक होते पूरक
मिलता जहाँ बालक के जीवन को आकार।

लेकिन जब कभी बालक तकलीफ़ में आता
माँ का रोम रोम बालक के लिए हर पल रोता
अचूक दवा, अचूक इलाज का करती वो प्रयास
सब तकलीफें उसकी हो, मन हुमायूं सा होता।
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हर मर्ज की दवा माँ के पोरों में  रहती
माना, कभी-कभी वह बेहद बेबस भी होती
हर दुविधा का हल वो भरसक खोजे
बेबस है माँ,पर कभी कमजोर ना होती।
अपर्णा शर्मा
May 12th,24

Mother’s day

बस अब और नहीं

कभी दूर-दूर तलक फैली हरियाली
अब कहीं दूर तलक दिखती नहीं
प्यासी धरती,भूखे,तड़पते निरीह जीव 
जंगल बोले,मेरा दोहन बस अब और नहीं।

कल कल करती बहती थी जो नदियां
कंकर पत्थर से भरी लगती है पगडण्डियाँ
बूंदे,बारिश,बादल ये सब स्वप्न से हुए
प्रदूषित नदियां यही कहे,बस अब और नहीं.

सुखदायी शब्दों की बरसातें
लगती जैसे अनमोल सौगातें
शांत मन से सही को पहचानो
अंतर्मन की आवाज,बस अब और नहीं।

कल,और भी सुंदर कल में उलझा आज
उज्ज्वल आगत में डूबा हर सपने का साज
हरा-भरा वर्तमान दूर तलक दिखता नहीं
अब भविष्य कह रहा,बस अब और नहीं
अपर्णा शर्मा
May10th,24

पलाश

पहाड़ों के आगोश में
दिलों के दबे अरमान से.
जब खिलते हैं पलाश
मचलती है फिर तलाश।
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जो बिछुड़ गया पत्र सा
पतझड़ के वियोग सा
खिला गया फिर बसंत
आ गया फिर सैलाब सा।

शंख सा शुभ आकार लिए
वनों में,दिलों में आग लिए
नदी सी निरव जिंदगी में
फिर वहीं अरमान सुलग गए।
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तेरे आगमन के अनंत होते इंतजार में
एक पुष्प और जुड़ा उस तेरे पुष्प हार में
जिस बरस ना खिलेगा जब ये पलाश
आखिरी बरस होगा शायद तेरे इंतजार में।
अपर्णा शर्मा
May 3rd,24

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