बचपन को खेल-कूद में जी गए
कितनी ही चोटें, रोकर भूल गए।
कभी खेल के उत्साह में आगे बढ़ गए
कभी अकेले रोने के डर से चुप हो गए।
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तमाम झमेलों के संग खाई जवानी में चोटें
दिल पर लगी चोटों पर, अकेले में रोते।
कामयाब, नाकामयाब के हजारों ही मसले
दिल में कसक बन, घाव आज भी रिसते।
शरीर पर गहनों से सजे है आज भी चोटों के निशान
कुछ दिलों पर चोट देकर, रहते हैं जैसे हो अनजान।
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सुना है,बुढ़ापे की चोट दुखती बहुत हैं
जानते हैं सभी, फिर भी दिल दुखाते बहुत हैं।
अपर्णा शर्मा
Jan.2nd,26
नदी और समंदर
पितृ गृह से जब इक धारा संकरी चल कर आई
वन,उपवन,हिम पर्वतों से हुई उसकी यूँ विदाई
अनजानी मंजिल है उसकी और अपरिचित सी राह
दूर समंदर तकता रस्ता और आंखों में रौनक छाई।
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बूँद बूँद रिसती,है वो दुर्बल,निर्बल धारा
ऊंचे नीचे रस्ते,नपे-तुले पग धरती धारा
जाने कब अल्हड़पन इसमें भर आया है
दूर समंदर उसके इंतजार में जीता अपना जीवन सारा।
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लिखे गए अनंत गीत,नदियों के संघर्षों पर
मीठापन मिट जाने के, गृह के विछोह दर्दों पर
प्रकट नहीं कर पाया समंदर कभी अपने एहसासों को
लेकर लांछन खारेपन का,जीता है अनंत आस पर।
अपर्णा शर्मा
Dec.26th,25
दादी ( शादियों के मौसम में)
सुनते ही,पौत्री के विवाह का शुभ समाचार
दादी के मासूम बूढ़े चेहरे पर खिल गई मुस्कान।
पौत्री के सर पर वार फ़ेर कर रही
नज़र उतारे और कभी बलैया ले रही।
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ना जाने बक्सा में दादी क्या उलट-पलट रही.
लाल रंग का कश्मीरी शॉल उपहार दे रही।
सीखों की पोथी भी दी है संग इसमें
सदैव यहीं तो साथ देंगी जीवन में।
सभी नेग चार पर दादी की पैनी नजर
भूल चूक ना हो, रखी है सबकी खबर।
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प्रति रात जब ढोलक पर थाप लगती
बन्नी गाते-गाते खुद भी ठुमक लगाती।
माँ से थोड़ी बढ़ कर प्यारी होती है दादी
हमारे हर राज की हमराज होती है दादी।
दादी बिन सूना लगता माँ का अंगना
सच हैं कि तुम बिन जिया जाए ना।
अपर्णा शर्मा
Dec.5th,25

