ए खुदा जिंदगी का कोरा कैनवास थमा कर ,तूने कूची और रंग थमा तो दिए है।
कुछ ही जो इस पर अपने मन के रंग लगाते हैं।
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बाकी बचे इंसान देखा देखी अपनी जिंदगी रंगते है और कुछ दबाव में कैनवास बेरंग कर देते हैं।
अपर्णा शर्मा
अप्रैल 2nd, 24
खाली हाथ*
जीवन में एक से बढ़कर एक मिलता रहा
उनके बिना जीना नामुमकिन सा लगता रहा.
जीवन में रच बस कर ,जीवन का सुकून से लगे
सोचता,कुछ ना छूटे,सब यूहीं मिलता रहे.
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हर वस्तु,मित्र,रिश्ते और शहर भी रूह से जुड़े रहे
इनके बिना जीना भी क्या जीना सा लगता रहे.
छूट गए सब, समय के साथ साथ और खाली हाथ रह गए
शायद इसको कहते हैं कि हम हाथ मलते रह गए।
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अब सुबह शाम की दवा बताए,कि तेरे बिना भी क्या जीना
यहीं है जीवन के भंवर में,सांसो की नाव को भरसक खेना।
अपर्णा शर्मा
March29th,24
मायूस घर
किसने कहा, कि त्योहार केवल इंसान ही मनाते हैं
उनके संग संग घर के दर –ओ–दीवार भी मुस्कुराते हैं
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त्योहार गुजरते ही,जब इंसान निकल जाते है अपनी कर्मभूमि को
मायूस घर,दूसरे त्योहार के इंतजार में, वहीं खड़े रह जाते हैं ।
अपर्णा शर्मा
March26th,24
